मेरी कहानी
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कभी मुझसे पूछा जाता था — "लिखते हो, वो ठीक है, पर करते क्या हो?" यह सवाल जताने के लिए होता था कि लेखन अपने आप में कोई बड़ा काम नहीं है, इससे ज़िंदगी नहीं चलती।

पर आज मैं गर्व से कह सकता हूँ — 2016 में "सावधान इंडिया" के एक एपिसोड को लिखने के मौके को मैंने ऐसा भुनाया कि आज मैं दिल्ली से निकलकर मुंबई शहर में बस चुका हूँ।

आज के समय की सबसे अच्छी बात यह है — मुंबई के लिए काम करने के लिए मुंबई में रहना ज़रूरी नहीं। आप अपने शहर में बैठकर भी इस इंडस्ट्री में काम कर सकते हैं। ज़रूरत है तो बस सही स्किल की, और सही कॉन्टैक्ट्स की।

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साथी लेखकों के नाम

मेरे लिए इन राइटिंग कोर्सेज़ का मक़सद सिर्फ़ फ़ीस लेकर आगे बढ़ना नहीं है। मैं चाहता हूँ कि मेरे पास बेहतर राइटर्स की एक टीम तैयार हो – जो नया सोचने का हौसला भी रखते हों, और समय पर या समय से पहले लिखने की क्षमता भी।

मैं आपको राइटर नहीं बना सकता – मैं मानकर चलता हूँ कि आप पहले से ही राइटर हैं। आपको बस ज़रूरत है रोज़ बदलते राइटिंग के माहौल को समझने की, उसकी शर्तें जानने की।

मुझे उम्मीद है कि जो समझने में मुझे 10 साल लगे, वह आप मुझसे कहीं बेहतर और कहीं जल्दी समझ लेंगे। मुझे पूरा यकीन है कि इन महीनों में आप अपनी क्राफ्ट बेहतर करेंगे, सिनेमा को अलग नज़र से देखेंगे, और स्क्रॉल करती इस भीड़ से खुद को अलग कर – स्क्रॉल रुकवाने वाले बनेंगे।

— सिद्धार्थ अरोड़ा 'सहर'